परिवर्तन कविता का सारांश
परिवर्तन सुमित्रानन्दन पंत अहे निष्ठुर परिवर्तन! तुम्हारा ही ताण्डव नर्तन विश्व का करुण विवर्तन! तुम्हारा ही नयनोन्मीलन निखिल उत्थान, पतन ! अहे वासुकि सहस्त्र फन! लक्ष्य अलक्षित चरण तुम्हारे चिन्ह निरंतर छोड़ रहे हैं जग के विक्षत वक्षस्थल पर! शत शत फेनोच्छ्वासित, स्फीत फुतकार भयंकर घुमा रहे हैं घनाकार, जगती का अम्बर! मृत्यु तुम्हारा गरल दन्त कंचुक कल्पान्तर, अखिल विश्व की विवर वक्र कुंडल दिग्मंडल! २ आज कहाँ वह पूर्ण-पुरातन, वह सुवर्ण का काल? भूतियों का दिगंत-छवि-जाल, ज्योति-चुम्बित जगती का भाल? राशि-राशि विकसित वसुधा का वह यौवन-विस्तार? स्वर्ग की सुषमा जब साभार धरा पर करती थी अभिसार! प्रसूनों के शाश्वत-श्रृंगार, (स्वर्ण-भृंगों क्र गंध-विहार) गूँज उठते थे बारंबार सृष्टि के प्रथमोद्गार! ...