मैथिलीशरण गुप्त की मातृभुमि
मैथिलीशरण गुप्त की मातृभुमि
नीलांबर परिधान हरित तट पर सुन्दर है।
सूर्य-चन्द्र युग मुकुट, मेखला रत्नाकर है॥
नदियाँ प्रेम प्रवाह, फूल तारे मंडन हैं।
बंदीजन खग-वृन्द, शेषफन सिंहासन है॥
करते अभिषेक पयोद हैं, बलिहारी इस वेष की।
हे मातृभूमि! तू सत्य ही, सगुण मूर्ति सर्वेश की॥
जिसके रज में लोट-लोट कर बड़े हुये हैं।
घुटनों के बल सरक-सरक कर खड़े हुये हैं॥
परमहंस सम बाल्यकाल में सब सुख पाये।
जिसके कारण धूल भरे हीरे कहलाये॥
हम खेले-कूदे हर्षयुत, जिसकी प्यारी गोद में।
हे मातृभूमि! तुझको निरख, मग्न क्यों न हों मोद में?
पा कर तुझसे सभी सुखों को हमने भोगा।
तेरा प्रत्युपकार कभी क्या हमसे होगा?
तेरी ही यह देह, तुझी से बनी हुई है।
बस तेरे ही सुरस-सार से सनी हुई है॥
फिर अन्त समय तू ही इसे अचल देख अपनायेगी।
हे मातृभूमि! यह अन्त में तुझमें ही मिल जायेगी॥
निर्मल तेरा नीर अमृत के से उत्तम है।
शीतल मंद सुगंध पवन हर लेता श्रम है॥
षट्ऋतुओं का विविध दृश्ययुत अद्भुत क्रम है।
हरियाली का फर्श नहीं मखमल से कम है॥
शुचि-सुधा सींचता रात में, तुझ पर चन्द्रप्रकाश है।
हे मातृभूमि! दिन में तरणि, करता तम का नाश है॥
सुरभित, सुन्दर, सुखद, सुमन तुझ पर खिलते हैं।
भाँति-भाँति के सरस, सुधोपम फल मिलते है॥
औषधियाँ हैं प्राप्त एक से एक निराली।
खानें शोभित कहीं धातु वर रत्नों वाली॥
जो आवश्यक होते हमें, मिलते सभी पदार्थ हैं।
हे मातृभूमि! वसुधा, धरा, तेरे नाम यथार्थ हैं॥
क्षमामयी, तू दयामयी है, क्षेममयी है।
सुधामयी, वात्सल्यमयी, तू प्रेममयी है॥
विभवशालिनी, विश्वपालिनी, दुःखहर्त्री है।
भय निवारिणी, शान्तिकारिणी, सुखकर्त्री है॥
हे शरणदायिनी देवि, तू करती सब का त्राण है।
हे मातृभूमि! सन्तान हम, तू जननी, तू प्राण है॥
जिस पृथ्वी में मिले हमारे पूर्वज प्यारे।
उससे हे भगवान! कभी हम रहें न न्यारे॥
लोट-लोट कर वहीं हृदय को शान्त करेंगे।
उसमें मिलते समय मृत्यु से नहीं डरेंगे॥
उस मातृभूमि की धूल में, जब पूरे सन जायेंगे।
होकर भव-बन्धन- मुक्त हम, आत्म रूप बन जायेंगे॥
सूर्य-चन्द्र युग मुकुट, मेखला रत्नाकर है॥
नदियाँ प्रेम प्रवाह, फूल तारे मंडन हैं।
बंदीजन खग-वृन्द, शेषफन सिंहासन है॥
करते अभिषेक पयोद हैं, बलिहारी इस वेष की।
हे मातृभूमि! तू सत्य ही, सगुण मूर्ति सर्वेश की॥
जिसके रज में लोट-लोट कर बड़े हुये हैं।
घुटनों के बल सरक-सरक कर खड़े हुये हैं॥
परमहंस सम बाल्यकाल में सब सुख पाये।
जिसके कारण धूल भरे हीरे कहलाये॥
हम खेले-कूदे हर्षयुत, जिसकी प्यारी गोद में।
हे मातृभूमि! तुझको निरख, मग्न क्यों न हों मोद में?
पा कर तुझसे सभी सुखों को हमने भोगा।
तेरा प्रत्युपकार कभी क्या हमसे होगा?
तेरी ही यह देह, तुझी से बनी हुई है।
बस तेरे ही सुरस-सार से सनी हुई है॥
फिर अन्त समय तू ही इसे अचल देख अपनायेगी।
हे मातृभूमि! यह अन्त में तुझमें ही मिल जायेगी॥
निर्मल तेरा नीर अमृत के से उत्तम है।
शीतल मंद सुगंध पवन हर लेता श्रम है॥
षट्ऋतुओं का विविध दृश्ययुत अद्भुत क्रम है।
हरियाली का फर्श नहीं मखमल से कम है॥
शुचि-सुधा सींचता रात में, तुझ पर चन्द्रप्रकाश है।
हे मातृभूमि! दिन में तरणि, करता तम का नाश है॥
सुरभित, सुन्दर, सुखद, सुमन तुझ पर खिलते हैं।
भाँति-भाँति के सरस, सुधोपम फल मिलते है॥
औषधियाँ हैं प्राप्त एक से एक निराली।
खानें शोभित कहीं धातु वर रत्नों वाली॥
जो आवश्यक होते हमें, मिलते सभी पदार्थ हैं।
हे मातृभूमि! वसुधा, धरा, तेरे नाम यथार्थ हैं॥
क्षमामयी, तू दयामयी है, क्षेममयी है।
सुधामयी, वात्सल्यमयी, तू प्रेममयी है॥
विभवशालिनी, विश्वपालिनी, दुःखहर्त्री है।
भय निवारिणी, शान्तिकारिणी, सुखकर्त्री है॥
हे शरणदायिनी देवि, तू करती सब का त्राण है।
हे मातृभूमि! सन्तान हम, तू जननी, तू प्राण है॥
जिस पृथ्वी में मिले हमारे पूर्वज प्यारे।
उससे हे भगवान! कभी हम रहें न न्यारे॥
लोट-लोट कर वहीं हृदय को शान्त करेंगे।
उसमें मिलते समय मृत्यु से नहीं डरेंगे॥
उस मातृभूमि की धूल में, जब पूरे सन जायेंगे।
होकर भव-बन्धन- मुक्त हम, आत्म रूप बन जायेंगे॥
मैथिलीशरण गुप्त
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जन्म
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मृत्यु
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दिसम्बर 12, 1964 (78 वर्ष की आयु में)
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व्यवसाय
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राष्ट्रीयता
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शिक्षा
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उल्लेखनीय कार्य
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पंचवटी, सिद्धराज, साकेत, यशोधरा, विश्ववेदना आदि
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उल्लेखनीय सम्मान
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राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त (३ अगस्त १८८६ – १२ दिसम्बर १९६४) हिन्दी के प्रसिद्ध कवि थे। हिन्दी साहित्य के इतिहास में वे खड़ी
बोली के प्रथम महत्त्वपूर्ण कवि हैं।[2] उन्हें साहित्य जगत में 'दद्दा' नाम से सम्बोधित किया जाता था। उनकी कृति भारत-भारती (1912) भारत के स्वतन्त्रता
संग्राम के समय में काफी प्रभावशाली सिद्ध हुई थी और और इसी कारण महात्मा
गांधी ने उन्हें 'राष्ट्रकवि' की पदवी भी दी थी।[3] उनकी जयन्ती ३ अगस्त को हर वर्ष 'कवि दिवस' के रूप में मनाया
जाता है। सन १९५४ में भारत
सरकार ने उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित
किया।[4]
महावीर प्रसाद द्विवेदी जी की प्रेरणा से गुप्त जी ने खड़ी
बोली को अपनी रचनाओं का माध्यम बनाया और अपनी कविता के
द्वारा खड़ी बोली को एक काव्य-भाषा के रूप में निर्मित करने में अथक प्रयास किया।
इस तरह ब्रजभाषा जैसी समृद्ध
काव्य-भाषा को छोड़कर समय और संदर्भों के अनुकूल होने के कारण नये कवियों ने इसे
ही अपनी काव्य-अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। हिन्दी कविता के इतिहास में यह गुप्त
जी का सबसे बड़ा योगदान है। घासीराम
व्यास जी उनके मित्र थे। पवित्रता, नैतिकता और परंपरागत मानवीय सम्बन्धों की रक्षा गुप्त जी के
काव्य के प्रथम गुण हैं, जो 'पंचवटी'
से लेकर 'जयद्रथ
वध', 'यशोधरा'
और 'साकेत'
तक में प्रतिष्ठित एवं प्रतिफलित हुए हैं। 'साकेत' उनकी रचना का
सर्वोच्च शिखर है।
जीवन परिचय
मैथिलीशरण गुप्त का जन्म ३ अगस्त १८८६ में पिता सेठ
रामचरण कनकने और माता काशी बाई की तीसरी संतान के रूप में उत्तर
प्रदेश में झांसी के पास चिरगांव में हुआ। माता और
पिता दोनों ही वैष्णव थे। विद्यालय में
खेलकूद में अधिक ध्यान देने के कारण पढ़ाई अधूरी ही रह गयी। रामस्वरूप शास्त्री, दुर्गादत्त पंत, आदि ने उन्हें
विद्यालय में पढ़ाया। घर में ही हिन्दी, बंगला, संस्कृत साहित्य का अध्ययन किया।
मुंशी अजमेरी जी ने उनका मार्गदर्शन किया। १२ वर्ष की अवस्था में ब्रजभाषा में कनकलता नाम से कविता
रचना आरम्भ किया। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के सम्पर्क में
भी आये। उनकी कवितायें खड़ी बोली में मासिक "सरस्वती" में प्रकाशित होना प्रारम्भ हो गई।
प्रथम काव्य संग्रह "रंग में भंग" तथा बाद
में "जयद्रथ वध" प्रकाशित हुई। उन्होंने बंगाली के काव्य ग्रन्थ
"मेघनाथ वध", "ब्रजांगना" का अनुवाद भी किया। सन् 1912 - 1913
ई. में राष्ट्रीय भावनाओं से ओत-प्रोत "भारत
भारती" का प्रकाशन किया। उनकी लोकप्रियता सर्वत्र फैल गई। संस्कृत के प्रसिद्ध
ग्रन्थ "स्वप्नवासवदत्ता" का अनुवाद प्रकाशित कराया। सन् १९१६-१७ ई. में
महाकाव्य 'साकेत'
की रचना आरम्भ की। उर्मिला के प्रति उपेक्षा
भाव इस ग्रन्थ में दूर किये। स्वतः प्रेस की स्थापना कर अपनी पुस्तकें छापना शुरु
किया। साकेत तथा पंचवटी आदि अन्य ग्रन्थ सन् १९३१ में पूर्ण किये। इसी समय वे
राष्ट्रपिता गांधी जी के निकट
सम्पर्क में आये। 'यशोधरा' सन् १९३२ ई. में
लिखी। गांधी जी ने उन्हें
"राष्टकवि" की संज्ञा प्रदान की। 16 अप्रैल 1941 को वे व्यक्तिगत
सत्याग्रह में भाग लेने के कारण गिरफ्तार कर लिए गए। पहले उन्हें झाँसी और फिर
आगरा जेल ले जाया गया। आरोप सिद्ध न होने के कारण उन्हें सात महीने बाद छोड़ दिया
गया। सन् 1948 में आगरा विश्वविद्यालय से उन्हें
डी.लिट. की उपाधि से सम्मानित किया गया। १९५२-१९६४ तक राज्यसभा के सदस्य मनोनीत
हुये। सन् १९५३ ई. में भारत
सरकार ने उन्हें पद्म
विभूषण से सम्मानित किया। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ॰ राजेन्द्र प्रसाद ने सन् १९६२ ई.
में अभिनन्दन ग्रन्थ भेंट किया तथा हिन्दू विश्वविद्यालय के द्वारा
डी.लिट. से सम्मानित किये गये। वे वहाँ मानद प्रोफेसर के रूप में नियुक्त भी हुए। १९५४ में साहित्य एवं
शिक्षा क्षेत्र में पद्म
भूषण से सम्मानित किया गया। चिरगाँव में उन्होंने
१९११ में साहित्य सदन नाम से स्वयं की
प्रैस शुरू की और झांसी में १९५४-५५ में मानस-मुद्रण की स्थापना की।
इसी वर्ष प्रयाग में "सरस्वती" की स्वर्ण जयन्ती समारोह का आयोजन हुआ जिसकी
अध्यक्षता गुप्त जी ने की। सन् १९६३ ई० में अनुज सियाराम शरण गुप्त के निधन ने
अपूर्णनीय आघात पहुंचाया। १२ दिसम्बर १९६४ ई. को दिल का दौरा पड़ा और साहित्य का
जगमगाता तारा अस्त हो गया। ७८ वर्ष की आयु में दो महाकाव्य, १९ खण्डकाव्य, काव्यगीत, नाटिकायें आदि लिखी। उनके काव्य में राष्ट्रीय चेतना, धार्मिक भावना और मानवीय उत्थान प्रतिबिम्बित है। 'भारत भारती' के तीन खण्ड में
देश का अतीत, वर्तमान और भविष्य चित्रित है। वे मानववादी, नैतिक और सांस्कृतिक काव्यधारा के विशिष्ट कवि थे। हिन्दी
में लेखन आरम्भ करने से पूर्व उन्होंने रसिकेन्द्र नाम से ब्रजभाषा में कविताएँ, दोहा, चौपाई, छप्पय आदि छंद लिखे। ये
रचनाएँ 1904-05 के बीच वैश्योपकारक (कलकत्ता), वेंकटेश्वर (बम्बई) और मोहिनी (कन्नौज) जैसी पत्रिकाओं
में प्रकाशित हुईं। उनकी हिन्दी में लिखी कृतियाँ इंदु, प्रताप, प्रभा जैसी पत्रिकाओं में छपती रहीं। प्रताप में विदग्ध हृदय नाम से उनकी अनेक
रचनाएँ प्रकाशित हुईं।
जयन्ती
मध्य
प्रदेश के संस्कृति राज्य मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा ने कहा
है कि राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की जयंती प्रदेश में प्रतिवर्ष तीन अगस्त को 'कवि दिवस' के रूप में
व्यापक रूप से मनायी जायेगी। यह निर्णय राज्य शासन ने लिया है। युवा पीढ़ी भारतीय
साहित्य के स्वर्णिम इतिहास से भली-भांति वाकिफ हो सके इस उद्देश्य से संस्कृति
विभाग द्वारा प्रदेश में भारतीय कवियों पर केन्द्रित करते हुए अनेक आयोजन करेगा।
कृतियाँ
·
महाकाव्य- साकेत, यशोधरा
·
खण्डकाव्य- जयद्रथ वध, भारत-भारती, पंचवटी, द्वापर, सिद्धराज, नहुष, अंजलि और अर्घ्य, अजित, अर्जन और विसर्जन, काबा और कर्बला, किसान, कुणाल गीत, गुरु तेग बहादुर, गुरुकुल , जय भारत, युद्ध, झंकार , पृथ्वीपुत्र, वक संहार [क], शकुंतला, विश्व वेदना, राजा प्रजा, विष्णुप्रिया, उर्मिला, लीला[ग], प्रदक्षिणा, दिवोदास [ख], भूमि-भाग
·
नाटक - रंग में भंग , राजा-प्रजा, वन वैभव [क], विकट भट , विरहिणी , वैतालिक, शक्ति, सैरन्ध्री [क], स्वदेश संगीत, हिड़िम्बा , हिन्दू, चंद्रहास
·
मैथिलीशरण गुप्त ग्रन्थावली (मौलिक तथा अनूदित समग्र कृतियों का संकलन 12 खण्डों में, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली से
प्रकाशित, लेखक-संपादक : डॉ. कृष्णदत्त
पालीवाल, पृष्ठ- 460, मूल्य- ₹9000, प्रथम
संस्करण-2008) (ISBN 978-81-8143-755-6)
·
फुटकर रचनाएँ- केशों की कथा, स्वर्गसहोदर, ये दोनों मंगल घट
(मैथिलीशरण गुप्त द्वारा लिखी पुस्तक) में संग्रहीत हैं।
·
अनूदित (मधुप के नाम से)-
·
संस्कृत- स्वप्नवासवदत्ता, प्रतिमा, अभिषेक, अविमारक (भास) (गुप्त जी
के नाटक देखें), रत्नावली (हर्षवर्धन)
·
काविताओं का संग्रह - उच्छवास
·
पत्रों का संग्रह - पत्रावली
गुप्त जी के नाटक
उपरोक्त नाटकों के अतिरिक्त गुप्त जी ने चार नाटक और
लिखे जो भास के नाटकों पर
आधारित थे। निम्न तालिका में भास के अनूदित नाटक
और उन पर आधारित गुप्त जी के मौलिक नाटक दिए हुए हैं:-
गुप्त जी के मौलिक नाटक
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भास जी के अनूदित नाटक
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अनघ
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स्वप्नवासवदत्ता
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चरणदास
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प्रतिमा
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तिलोत्तमा
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अभिषेक
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निष्क्रिय
प्रतिरोध
|
आविमारक
|
काव्यगत विशेषताएँ
गुप्त जी स्वभाव से ही लोकसंग्रही कवि थे और अपने युग
की समस्याओं के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील रहे। उनका काव्य एक ओर वैष्णव भावना
से परिपोषित था, तो साथ ही जागरण व सुधार युग की राष्ट्रीय नैतिक
चेतना से अनुप्राणित भी था। लाला
लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, विपिनचंद्र
पाल, गणेश शंकर विद्यार्थी और मदनमोहन
मालवीय उनके आदर्श रहे। महात्मा
गांधी के भारतीय राजनीतिक जीवन में आने से पूर्व ही गुप्त
जी का युवा मन गरम दल और तत्कालीन क्रान्तिकारी विचारधारा से प्रभावित हो चुका था।
'अनघ' से पूर्व की
रचनाओं में, विशेषकर जयद्रथ-वध और भारत
भारती में कवि का क्रान्तिकारी स्वर सुनाई पड़ता है। बाद
में महात्मा
गांधी, राजेन्द्र प्रसाद, और विनोबा
भावे के सम्पर्क में आने के कारण वह गांधीवाद के
व्यावहारिक पक्ष और सुधारवादी आन्दोलनों के समर्थक बने।
·
(१) राष्ट्रीयता और गांधीवाद की प्रधानता
·
(२) गौरवमय अतीत के इतिहास और भारतीय संस्कृति की
महत्ता
·
(३) पारिवारिक जीवन को भी यथोचित महत्ता
·
(४) नारी मात्र को विशेष महत्व
·
(५) प्रबन्ध और मुक्तक दोनों में लेखन
·
(७) पतिवियुक्ता नारी का वर्णन
राष्ट्रीयता तथा गांधीवाद
मैथिलीशरण गुप्त के जीवन में राष्ट्रीयता के भाव
कूट-कूट कर भर गए थे। इसी कारण उनकी सभी रचनाएं राष्ट्रीय विचारधारा से ओत प्रोत
है। वे भारतीय संस्कृति एवं इतिहास के परम भक्त थे। परन्तु अन्धविश्वासों और थोथे
आदर्शों में उनका विश्वास नहीं था। वे भारतीय संस्कृति की नवीनतम रूप की
कामना करते थे।
गुप्त जी के काव्य में राष्ट्रीयता और गांधीवाद की प्रधानता है।
इसमें भारत के गौरवमय अतीत के इतिहास और भारतीय संस्कृति की महत्ता का
ओजपूर्ण प्रतिपादन है। आपने अपने काव्य में पारिवारिक जीवन को भी यथोचित महत्ता
प्रदान की है और नारी मात्र को विशेष महत्व प्रदान किया है। गुप्त जी ने प्रबंध
काव्य तथा मुक्तक
काव्य दोनों की रचना की। शब्द शक्तियों तथा अलंकारों के
सक्षम प्रयोग के साथ मुहावरों का भी प्रयोग किया है।
भारत
भारती में देश की वर्तमान दुर्दशा पर क्षोभ प्रकट करते हुए
कवि ने देश के अतीत का अत्यंत गौरव और श्रद्धा के साथ गुणगान किया। भारत श्रेष्ठ
था, है और सदैव रहेगा का भाव इन पंक्तियों में गुंजायमान
है-
भूलोक का गौरव, प्रकृति का पुण्य
लीला-स्थल कहाँ?
फैला मनोहर गिरि हिमालय और गंगाजल कहाँ?
संपूर्ण देशों से अधिक किस देश का उत्कर्ष है?
उसका कि जो ऋषि भूमि है, वह कौन, भारतवर्ष है।
मातृभुमि कविता का सारांश
'मातृभूमि' गुप्तजी की एक लोकप्रिय कविता है। कवि को मातृभूमि, भूमि का सिर्फ एक खंड नहीं अपितु
सर्वेश सर्वगुण सम्पन्न लगता है। कवि के अनुसार हमारी मातृभुमि सबसे सुन्दर, वैभवशाली और अमृतनयी है।
कवि मातृभुमि के उपकार से दवे हुए है। उस उपकार का प्रतिदान दे पाना कवि के लिए
असन्भव है।
कवि धरती का रूप वर्नण करते हुए कहते हैं - इस हरी-भरी धरती पर आकाशरूपी नीला वस्त्र सुंदर लग
रहा है। अर्थात धरती
नील परिधान धारण की हुई है। मातृभूमि के मुकुट हैं सूर्य और चंद्र ( दिन को मुकुट सूर्य है, रात को चंद्र )। समुद्र उसकी करधनी (कमरबंद) है, नदियाँ प्रेम-प्रवाह है। अर्थात
मातृभुमि के हृदय में देशवासियों के प्रति रहने वाली
प्रेम की भावना है। फूल और
तारे उनके आभूषण
हैं। यहाँ के सारे पक्षीगण मातृभूमि की वंदना करनेवाले चारण के समान हैं और शेषनाग के
फन रूपी सिंहासन पर भारत माता विराजमान है। मेघ उनपर वर्षा का अभिषेक करता है। कवि मातृभूमि की इस सुंदर सगुण मूर्ति पर आत्म समर्पण करते
हैं। वे कहते हैं -
हे मातृभूमि ! तू वस्तुतः निर्गुण सर्वेश की सगुण साकार मूर्ति है। कवि आगे मातृभूमि के साथ रहनेवाले सम्बन्ध को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि इसी मातृभूमि की धूल
में लोट-लोट कर हम बड़े हुए हैं। इसी भूमि पर घुटनों के बल चलते-चलते
हम पैरों पर खड़े होने लायक बने है। यहीं रहकर हमने परमज्ञान का परमानंद पाया। जिस ज्ञान से
हमारा जीवन हीरे की तरह चमकदार बना है। हम तेरी ही गोद में खेल कूद कर हर्ष का अनुभव करते हैं। इसलिए हे मातृभूमि ! तुझे देखते ही हम आनंद विभोर हो जाते हैं। तू जननी है। यहाँ हम
जितना भी सुख पाते हैं सब तेरा दिया हुआ है। यह देह तेरे द्वारा दी हुई है, यह तुझसे ही बनी है, तेरे ही रस में सनी हुई है। अंत में जब हमारी मृत्यु हो जाएगी तब
हम तुझमें ही मिल जाते हैं। माँ अपनी संतानों के लिए जीती है। उसके बदले में
संतानें जो भी करें, जितना भी
करें कम पड़ जाएगा। तभी तो कवि कहते हैं कि हे मातृभूमि ! तू हमारे लिए जो करती है
उसका प्रत्युपकार
हमसे नहीं हो पाएगा। कवि मातृभुमि से कहते है, जिस प्रकार मातृभुमि ने हमे जीवन दिया है
उसी प्रकार जीवन के अतं में मातृभुमि में ही मिल जाना है।
मातृभुमि का गुण गान करते हुए कवि कहते है- इस मातृभुमि
का पेय जल अमृत के समान जीवनदायक है और शीतल मंद पवन समस्त थकावट को समाप्त कर
देता है। ॠतु परिर्वतन का प्राकृतिक क्रम इस धरती को अद्भुत सौर्न्दयवान बना देता
है,मखमल से भी कोमल इस धरती की हरियाली है। इस मातृभुमि में रात को चन्द्रमा अपनी
चान्दिनी से अमृत बिखेर देता है और दिन में सूर्य अपनी प्रकाश से अन्धकार रूपी
सारे दुखो को नाश कर देता है। हे मातृभुमि, तुम्हारे ऊपर भिन्न प्रकार के सुगन्धित
फुल खिलते है औए भांति- भांति के रस से भरे मधुर अमृत के समान फल खिलते है। जिसका
सेवन कर के लोग स्वस्थ एवं पुष्ट रहते है। तुम्हारे जंगलो में विभिन्न औषधियों के
पेड मिलते है, और खानें धातु तथा रत्नों से भरे पडे है। कवि मातृभुमि को सम्बोधित
करते हुए कहते है- तुम्हा वसुधा, धरा आदि सभी नाम सार्थक है, क्योकि जीवन की सारी
आवश्यक सानग्री तुम्ही से प्राप्त होती है। मातृभुमि मां की तर क्षमामयी, दयानयी,
सुधामयी, वात्साल्यनयी, प्रेममयी तथा सूरक्षा देनेवाली है। यही मातृभुमि
ऐश्वर्यवान, विश्व को पालन करनेवाली, दु:ख और भय को नाश करनेवाली, शन्ति और सुख
देनेवाली है। कवि मातृभुमि को शरणदायिनी तथा जननी कहा है। आगे कहते है इस भुमि ने
हमे वीर पूर्वज दिये है, जिसके इतिहास और संस्कार ने हमे समृद्ध बनाया है।
अंत में कवि कहते है- मातृभुमि की सूरक्षा के
लिए हम अपने जीवन को उर्सगित करने से नहीं डरेंगे। कवि के अनुसार जीवन की र्साथकता
उसी में है, जब हम संसार की मोह- माया से मुक्त होकर अपनी मातृभुमि में सर्मपित हो
जायेंगे।
इस कविता के ज़रिए अपनी मातृभूमि
के प्रति कवि के गर्व और गौरव की भावनाएँ व्यक्त हुई हैं।
कठिन शब्दों का अर्थ- तट-भूमि, मेखला- कमरबंद, रत्नाकर- समुद्र, नडंन- आभूषण बंदीजन- चारण खग- पक्षी शेषफन- शेषनाग पयोद- मेघ परमहंस- परमज्ञान प्रत्युतपकार- उपकार का मूल्य सुरस- अमृत शुचि- चन्द्रमा तरणि- सूर्य न्यारे- अलग।
कठिन शब्दों का अर्थ- तट-भूमि, मेखला- कमरबंद, रत्नाकर- समुद्र, नडंन- आभूषण बंदीजन- चारण खग- पक्षी शेषफन- शेषनाग पयोद- मेघ परमहंस- परमज्ञान प्रत्युतपकार- उपकार का मूल्य सुरस- अमृत शुचि- चन्द्रमा तरणि- सूर्य न्यारे- अलग।

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